Somvati Amavasya on 2 December 2013 सोमवती अमावस्या

दिनाकं 2-12-2013 को सोमवती अमावस्या है यह दिन  पित्र दोष , काल सर्प दोष की शांति के लिए बहुत ही शुभ दिन है।

सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। ये वर्ष में लगभग एक ही बार पड़ती है। इस अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व होता है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु कामना के लिए व्रत का विधान है।

इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ को चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

इस  दिन रद्राभिषेक कराना चाहिए। नाग के जोड़े चांदी या सोने में बनवाकर उन्हें बहते पानी में प्रवाहित कर दें। सोमवती अमावस्या को दूध की खीर बना, पितरों को अर्पित करने से भी इस दोष में कमी होती है . या फिर प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है . शनिवार के दिन पीपल की जड़ में गंगा जल, काले  तिल चढ़ाये । पीपल और बरगद के वृ्क्ष की पूजा करने से पितृ दोष की शान्ति होती है।

किसी भी शिव मंदिर में सोमवती अमावस्या या नाग पंचमी के दिन ही काल सर्प दोष की शांति करनी चाहिए।  काल के स्वामी महादेव शिव जी है सिर्फ शिव जी है जो इस योग से मुक्ति दिला सकते है क्योंकि नाग जाति के गुरु महादेव शिव हैं। शास्त्रो में जो उपाय बताए गये हैं उनके अनुसार जातक किसी भी मंत्र का जप करना चाहे, तो निम्न मंत्रों में से किसी भी मंत्र का जप-पाठ आदि कर सकता है।
१- ऊँ नम शिवाय मंत्र का  जप करना चाहिए और शिवलिंग के उपर गंगा जल, काले  तिल चढ़ाये ।
२ – महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है।

3 -नव नाग स्तुति  का पाठ करें

अनंतं वासुकिं शेषंपद्म नाभं च कम्बलं।

शंख पालं धृत राष्ट्रं तक्षकं कालियंतथा॥

एतानि नव नामानि नागानां चमहात्मनां।

सायं काले पठेन्नित्यं प्रातः कालेविशेषतः॥

तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयीभवेत्॥

जिनकी कुंडली में शनि ग्रह के कारण चंद्रमा कमजोर हो रहा है या साढ़ेसती चल रही हो और वह मानसिक विकारों से दिन-प्रतिदिन ग्रस्त होते जा रहे हों, वे सोमवती अमावस्या पर दूध, चावल, खीर, चांदी, फल, मिष्ठान और वस्त्र इत्यादि अपने पितरों के निमित्त पिंडदान करवाकर इतना पुण्य प्राप्त कर सकते है, जिससे उनकी कुंडली में जरूरी ग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक रूप धारण कर लेगी।

सोमवती अमावस्या पर स्त्रिया अपने सुहाग की रक्षा और आयु की वृद्धि के लिए पीपल की पूजा करती हैं। पीपल के वृक्ष को स्पर्श करने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है और परिक्रमा  करने से आयु बढ़ती है और व्यक्ति मानसिक तनाव से मुक्त हो जाता है। अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है और पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

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Introduction of Eighth Mahavidya Baglamukhi in Hindi महाविद्या बगलामुखी

Introduction of Dus Mahavidya Baglamukhi in Hindi

अष्टम  महाविद्या बगलामुखी का  परिचय हिंदी में                                                     Download this Article

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Baglamukhi Information in Hindi

 भगवती बगला सुधा-समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय  मण्डप में रत्नवेदी पर रत्नमय सिंहासन पर विराजती हैं।  पीतवर्णा होने के कारण ये पीत रंग के ही वस्त्र, आभूषण व माला धारण किये हुए हैं।इनके एक हाथ में शत्रु की  जिह्वा  और दूसरे हाथ में मुद्गर  है। व्यष्टि रूप में शत्रुओं का नाश करने वाली और समष्टि रूप में परम ईश्वर की सहांर-इच्छा  की अधिस्ठात्री शक्ति बगला है।

श्री प्रजापति ने बगला उपासना वैदिक रीती से की और वे सृस्टि की संरचना करने में सफल हुए। श्री प्रजापति ने इस    विद्या का उपदेश सनकादिक मुनियों को दिया।  सनत्कुमार ने इसका उपदेश श्री नारद को और श्री नारद ने सांख्यायन  परमहंस को दिया, जिन्होंने छत्तीस पटलों में “बगला तंत्र” ग्रन्थ की रचना की। “स्वतंत्र तंत्र” के अनुसार भगवान् विष्णु  इस विद्या के उपासक हुए। फिर श्री परशुराम जी और आचार्य द्रोण इस विद्या के उपासक हुए। आचार्य द्रोण ने यह  विद्या परशुराम जी से ग्रहण की।

श्री बगला महाविद्या ऊर्ध्वाम्नाय के अनुसार ही उपास्य हैं, जिसमें स्त्री (शक्ति) भोग्या नहीं बल्कि पूज्या है। बगला    महाविद्या “श्री कुल” से सम्बंधित हैं और अवगत हो कि श्रीकुल की सभी महाविद्याओं की उपासना अत्यंत सावधानी पूर्वक गुरु के मार्गदर्शन में शुचिता बनाते हुए, इन्द्रिय निग्रह पूर्वक करनी चाहिए। फिर बगला शक्ति तो अत्यंत तेजपूर्ण शक्ति हैं, जिनका उद्भव ही स्तम्भन हेतु हुआ था। इस विद्या के प्रभाव से ही महर्षि  च्यवन ने इंद्र के वज्र को स्तंभित कर दिया था। श्रीमद् गोविंदपाद की समाधि में विघ्न डालने से रोकने के लिए आचार्य श्री शंकर ने रेवा नदी का स्तम्भन इसी महाविद्या के प्रभाव से किया था। महामुनि श्री निम्बार्क ने कस्सी ब्राह्मण को इसी विद्या के प्रभाव से नीम के वृक्ष पर, सूर्यदेव का दर्शन कराया था। श्री बगलामुखी को “ब्रह्मास्त्र विद्या” के नामे से भी जाना जाता है।  शत्रुओं का दमन और विघ्नों का शमन करने में विश्व में इनके समकक्ष कोई अन्य देवता नहीं है।

Baglamukhi Mantra in Hindi
Baglamukhi Mantras in Hindi

भगवती बगलामुखी को स्तम्भन की देवी कहा गया है।  स्तम्भनकारिणी शक्ति नाम रूप से व्यक्त एवं अव्यक्त सभी पदार्थो की स्थिति का आधार पृथ्वी के रूप में शक्ति ही है, और बगलामुखी उसी स्तम्भन शक्ति की अधिस्ठात्री देवी हैं।  इसी स्तम्भन शक्ति से ही सूर्यमण्डल स्थित है, सभी लोक इसी शक्ति के प्रभाव से ही स्तंभित है।  अतः साधक गण को चाहिये कि ऐसी महाविद्या कि साधना सही रीति व विधानपूर्वक ही करें।

अब हम साधकगण को इस महाविद्या के विषय में कुछ और जानकारी देना आवश्यक समझते है, जो साधक इस साधना को पूर्ण कर, सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इन तथ्यो की जानकारी होना अति आवश्यक है।

1 ) कुल : – महाविद्या बगलामुखी “श्री कुल” से सम्बंधित है।

2 ) नाम : – बगलामुखी, पीताम्बरा , बगला , वल्गामुखी , वगलामुखी , ब्रह्मास्त्र विद्या

3 ) कुल्लुका : – मंत्र जाप से पूर्व उस मंत्र कि कुल्लुका का न्यास सिर में किया जाता है। इस विद्या की कुल्लुका “ॐ हूं छ्रौम्” (OM HOOM Chraum)

4)  महासेतु  : – साधन काल में जप से पूर्व ‘महासेतु’ का जप किया जाता है।  ऐसा करने से लाभ यह होता है कि साधक प्रत्येक समय, प्रत्येक स्थिति में जप कर सकता है।  इस महाविद्या का महासेतु “स्त्रीं” (Streem)  है।  इसका जाप कंठ स्थित विशुद्धि चक्र में दस बार किया जाता है।

5)  कवचसेतु :- इसे मंत्रसेतु भी कहा जाता है।  जप प्रारम्भ करने से पूर्व इसका जप एक हजार बार किया जाता है।  ब्राह्मण व छत्रियों के लिए “प्रणव “, वैश्यों  के लिए “फट” तथा शूद्रों के लिए “ह्रीं” कवचसेतु  है।

6 ) निर्वाण :-  “ह्रूं ह्रीं श्रीं” (Hroom Hreem Shreem) से सम्पुटित मूल मंत्र का जाप ही इसकी निर्वाण विद्या है। इसकी दूसरी विधि यह है कि पहले प्रणव कर, अ , आ , आदि स्वर तथा क, ख , आदि व्यंजन पढ़कर मूल मंत्र पढ़ें और अंत में “ऐं” लगाएं और फिर विलोम गति से पुनरावृत्ति करें।

7 ) बंधन :- किसी विपरीत या आसुरी बाधा को रोकने के लिए इस मंत्र का एक हजार बार जाप किया जाता है। मंत्र इस प्रकार है ” ऐं ह्रीं ह्रीं ऐं ” (Aim Hreem Hreem Aim)

8) मुद्रा :- इस विद्या में योनि मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।

9) प्राणायाम : –  साधना से पूर्व दो मूल मंत्रो से रेचक, चार मूल मंत्रो से पूरक तथा दो मूल मंत्रो से कुम्भक करना चाहिए। दो मूल मंत्रो से रेचक, आठ मूल मंत्रो से पूरक तथा चार मूल मंत्रो से कुम्भक करना और भी अधिक लाभ कारी है।

10 ) दीपन :-  दीपक जलने से जैसे रोशनी हो जाती है, उसी प्रकार दीपन से मंत्र प्रकाशवान हो जाता है। दीपन करने हेतु मूल मंत्र को योनि बीज ” ईं ” ( EEM ) से संपुटित कर सात बार जप करें

11) जीवन अथवा प्राण योग : – बिना प्राण अथवा जीवन के मन्त्र निष्क्रिय होता है,  अतः मूल मन्त्र के आदि और अन्त में माया बीज “ह्रीं” (Hreem) से संपुट लगाकर सात बार जप करें ।

12 ) मुख शोधन : –  हमारी जिह्वा अशुद्ध रहती है, जिस कारण उससे जप करने पर लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। अतः “ऐं ह्रीं  ऐं ” मंत्र से दस बार जाप कर मुखशोधन करें

13 ) मध्य दृस्टि : – साधना के लिए मध्य दृस्टि आवश्यक है। अतः मूल मंत्र के प्रत्येक अक्षर के आगे पीछे “यं” (Yam) बीज का अवगुण्ठन कर मूल मंत्र का पाँच बार जप करना चाहिए।

14 ) शापोद्धार : – मूल मंत्र के जपने से पूर्व दस बार इस मंत्र का जप करें –
” ॐ हलीं बगले ! रूद्र शापं विमोचय विमोचय ॐ ह्लीं स्वाहा ”

(OM Hleem Bagale ! Rudra Shaapam Vimochaya Vimochaya  OM Hleem Swaahaa )

15 ) उत्कीलन : – मूल मंत्र के आरम्भ में ” ॐ ह्रीं स्वाहा ” मंत्र का दस बार जप करें।

16 ) आचार :-  इस विद्या के दोनों आचार हैं, वाम भी और दक्षिण भी ।

17 ) साधना में सिद्धि प्राप्त न होने पर उपाय : –  कभी कभी ऐसा देखने में आता हैं कि बार बार साधना करने पर भी सफलता हाथ नहीं आती है। इसके लिए आप निम्न वर्णित उपाय करें –

a) कर्पूर, रोली, खास और चन्दन की स्याही से, अनार की कलम से भोजपत्र पर वायु बीज “यं” (Yam) से मूल मंत्र को अवगुण्ठित कर, उसका षोडशोपचार पूजन करें। निश्चय ही सफलता मिलेगी।

b) सरस्वती बीज “ऐं” (Aim)  से मूल मंत्र को संपुटित कर एक हजार जप करें।

c)  भोजपत्र पर गौदुग्ध से मूल मंत्र लिखकर उसे दाहिनी भुजा पर बांध लें। साथ ही मूल मंत्र को “स्त्रीं” (Steem)  से सम्पुटित कर उसका एक हजार जप करें

18 ) विशेष : – गंध,पुष्प, आभूषण, भगवती के सामने रखें। दीपक देवता के दायीं ओर व धूपबत्ती बायीं ओर रखनी चाहिए। नैवेद्य (Sweets, Dry Fruits ) भी देवता के दायीं ओर ही रखें। जप के उपरान्त आसन से उठने से पूर्व ही अपने द्वारा किया जाप भगवती के बायें हाथ में समर्पित कर दें।

अतः ऐसे साधक गण जो किन्ही भी कारणो से यदि अभी तक साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकें हैं, उपर्युक्त निर्देशों का पालन करते हुए पुनः एक बार फिर संकल्प लें, तो निश्चय ही पराम्बा पीताम्बरा की कृपा दृस्टि उन्हें प्राप्त होगी – ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।

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Bhairav Ashtami on 25th November 2013

Bhairav Ashtami on 25th November 2013

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भैरव अष्टमी विशेष-

इस बार २५ नवम्बर २०१३ को भैरव अष्टमी का पर्व है, भैरव शिव के ही रूप है, भैरव के ही स्वरुप करीब सभी लोगो के कुल देवता भी होते है, मुख्यतः भैरव ८ प्रकार के बताये गए है, भैरव काल से परे है और मुख्यतः उग्र स्वाभाव वाले और शत्रु नाश करने वाले माने जाते है, इनका निवास स्थान शमशान है, भैरव सेनापति की भूमिका निभाते है जहा महाकाल अर्थात महादेव राजा है वही पर भैरव सेना पति के रूप में विराजमान है, भैरव जी को पूजने से उनके आशीर्वाद से शत्रु नाश होता है, कोर्ट कचहरी में विजय प्राप्त होती है, भय का नाश होता है, इत्यादि…
भैरव बहुत ही तीव्र देव है इनका आह्वाहन तंत्र में के अंतर्गत देवी साधनाओ में भी किया जाता है साथ ही साथ इनकी शक्ति इतनी तीव्र और भयंकर होती है जो एक बार चल जाने पर शत्रु का सर्वनाश कर देने का दम रखती है, इनकी शक्ति कभी माफ नहीं करती, भैरव स्वभावतः बहुत ही उग्र रहे है साथ ही, कई सिद्धियो के दाता भी माने गए है.. भैरव जी को पूजने से जन्मो जन्मो के घोर कष्ट और दोष बहुत तीव्रता से दूर हो जाते है.. आप लोग भी भैरव जी को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करे..

भैरव अष्टमी पर संध्या या रात्रि में नहा कर साफ़ कपडे पहन कर, भैरव मंदिर जाये, कोशिश करे के मंदिर जाने और वापस आने तक किसी से अधिक बात ना करे और दर्शन के बाद सीधे अपने घर पर ही वापस आये, “ओम श्री काल भैरवाय नमः” का मानसिक जाप करते हुए भैरव जी को आप वस्त्र, २ अगरबत्ती, धुप, दीप, नारियल, मिठाई (विशेषतः जलेबी या इमरती), और जल अर्पित कर सकते है. भैरव जी के सामने उक्त सामग्री अर्पित करने के पश्चात उनसे हाथ जोड़ कर अपने रोग, ऋण, दोष, और व्याधियो को दूर करने की प्रार्थना करे, उनसे अपने और अपने परिवार की रक्षा और कल्याण की प्रार्थना करे…
काल भैरव आप सभी का कल्याण करे और आपके रोग दोष दूर करे.

जय महाकाल

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Sharabh Saluva Pakshiraj Sarabeswara Kavacham शरभेश्वर कवच

Sarabeswara Kavacham (To get overall protection from enemies, black magic, acute illness) 

शरभेश्वर कवच  ( शरभ तंत्रम्   पक्षिराज तंत्रम् आकाश भैरव )

OveSharabha Mantra Sadhana, Kavacham Evam Siddhircome difficulties, both natural and man-made , worship Lord Sarabeswara, who will come to your rescue readily. 

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The present day world is affected by natural calamities like earthquake, tsunami, floods, cyclone and lightning, besides man-made afflictions causing Ozone-belt depletion, Nuclear Holocaust, Abichara Prayoga, accidents, etc. The worship of Sri Sarabeswara, the most powerful manifestation of Lord Shiva, is very essential to combat these evils and to save the mankind from such catastropies. It is but curious to note that Lord Rudra, true to his name, took the avatar of Sri Sarabeswara to control the anger of Sri Narasimha (an incarnation of Lord Vishnu) , when the latter did not get appeased, even after annihilating the demon King Hiranya Kasipu.

Sri Sarabeswara in Vedas and ancient works :

The advent of Sri Sarabeswara has been vividly mentioned in Atharva Veda, Linga Purana, Skanda Purana and Brahmanda Purana. Special mention is also made in Rigveda and Thaitriya as well, at the Uttara bhaga of Sri Lalitha Sahasranama.

“Paayaanno Deva: Sarabasthva Payaath
Sathaarirogath Vipinorakaapyam
Vaiswanaro Kugari Ritchakebya:
Prethebyo Bhoothebyo Rusha: Krudanthan” ||
(Atharva Veda) 

The Veda mantras affirm that all our sins are wiped off by chanting the powerful mantra of Sri Sarabha. Sage Veda Vyasa in his Linga Purana (96th Chapter) categorically says that those who worship Sri Sarabeswara, will get rid of all the afflictions caused by bad dreams, chronic ailments, poisonous bites, besides the great disasters caused by earthquake, floods, cyclone, thunder, lightning and such bad conglomerations.

“Sarva Vigna Prasamanam, Sarva Vyadi Vinasanam
Arichakra Prasamanam, Sarva Dukka Vinasanam,
Atraanyothpada Bookamba thaavagni Paamasu Vrishtisu
Thatho duswapna Samanam, Sarvabhootha Nivaranam,
Vishagraha Kshayakaram Puthra powthraadhi Vardhanam,
Thathraksha Daaranam Kuryaath Jangamaangey Varaananey”|| Linga Purana – 96

Avatar of Lord Sarabeswara: 

According to the Puranas, Hiranya Kasipu, the demon king, due to augmented audacity and ego, proclaimed himself as ‘God’and entreated everybody to worship him. His pious and upright son Sri Prahlada refuted his father’s action, by saying that only Lord Vishnu (Narayana) is the protector of the universe who is an all pervader. Out of rage and being exasperated by his son’s continued disobedience, one day Hiranya hit one of the pillars in his palace with his mace, to find out whether Lord Narayana was hiding there, as believed by his son. To make his devotee’s words come true, Lord Narayana appeared from inside the broken pillar, in the form of Narasimha, a man with a Lion’s head, who killed the demon King in an encounter. Unfortunately His anger and fierceness did not subside, even after annihilation of the demon and the three worlds trembled in fear. All the Devas headed by Lord Brahma appealed to Lord Shiva to appease the anger of Lord Narasimha. The compassionate Lord Shiva sent His lieutenant Agora Veerabhadra to do the job, but it went in vain. The ‘rajoguna’ caused by tasting the blood of the demon did not let Lord Narasimha to calm down. Veerabhadra unable to subdue Sri Narasimha, prayed to Lord Shiva to intervene. There appeared the most terrible form of a combination of man, bird and animal. It was a queer combination of man with Saraba (Bird) and Yaali (animal), celebratedly known and worshipped by the name Sri Sarabeswara, being the Thirtieth avatar of Lord Shiva amongst His Sixty four incarnations.

Sri Sarabeswara, sporting two huge wings, (representing Soolini Durga and Pratyangira Devi), eight legs, the nose of an eagle, four arms carrying fire, serpent, a deer and the ankus, with fingers having sharp nails looking very fierce and turbulent, came flying and comforted Sri Narasimha with his two wings to calm down. But the fiery energy stored in the latter came out in the form of a bird called ‘Kandaberunda’ and started to fight with Sri Sarabha and this divine encounter continued for eighteen days. Lord Sarabeswara decided to conclude this ‘sport’. By His will, Goddess Prathyankira Devi came out of one of his wings, took a huge physical form, gulped the ‘Kandaberunda’bird and brought its end. Sri Narasimha realising his erroneous action, praised Lord Sarabeswara with beautiful epithets, which later became the Ashtothra (108 Names) of the victorious Lord. Lord Shiva then revealed to all the Devas that “to annihilate the Asura, Lord Narasimha came, and to appease Lord Narasimha, I have come as Sarabeswara. Be aware that we are both one and the same like water and water, milk and milk, ghee and ghee, both inseparable and to be worshipped as one”.

“Yatha Jaley Jalam, Kshiptham, Ksheeram, Ksheeray Kruthang Kruthey|
Yekayeva Thatha Vishnu: Shiva Leetho Nachanyatha”||

Lord Brahma, out of gratitude for saving the universe from the anger of Sri Narasimha, worshipped Lord Sarabeswara with “Sri Sarabeswara Ashtothra”. At the very appearance of Lord Sarabeswara glittering like thousand Suns, the rage of Narasimha subsided and the entire universe heaved with relief. Let Sri Sarabeswara protect us for ever, from any disaster.

Lord Sarabeswara as Saviour: 

As already mentioned, the worship of Sri Sarabeswara is the most efficacious and timely one, among the Hindu Gods. Those who are suffering due to oppression from superiors in their profession, those who are ill-treated by elders and affluent relatives in their family, those who are threatened by blackmailers and miscreants to collect booty, and last but not the least, those who want to overcome difficulties both natural and man-made, should worship the most compassionate and valiant Sri Sarabeswara. He will come to their rescue readily.

Neela Kantaya Rudraya Sivaya Sasimousiney,
Bavaya Bava Nathaya Pakshirajaya theynamaha:|
Gangadaraya Sambaya Paramananda Thejasey,
Sarvesvaraya Santhaya Sarabaya Namo Namaha: ||

“Salutation to Lord Shiva, the most compassionate One, who radiates kindness and bliss all over. He appears with a blue-coloured neck, carrying river Ganga and the crescent Moon on His head. He removes all our sins and re-births, as the supreme Lord of the Universe. He is also known by various other names like Neelakanta, Rudra. Bavanatha, Gangadara, Sambava, Sarveswara etc. He came as the monarch of all the birds as “Pakshiraja”, whom we adore as “Sri Sarabeswara”, to protect us from the evils
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Swarnakarshan Bhairav Mantra Sadhana Evam Siddhi By Shri Yogeshwaranand Ji स्वर्णाकर्षण भैरव मंत्र साधना

Swarnakarshan Bhairav Sadhana eliminates all kind of dangers and financial problems. If done without any expectation, it gives yoga siddhi and moksha prapti. Swarnaakarshana Bhairava Sadhana removes all kinds of miseries and blesses the sadhaka with everlasting happiness. All kinds of siddhis are blessed by lord bhairava to the true Sadhaka.

Swarnakarshan Bhairav Sadhana is done along with ma baglamukhi sadhana. Swarnakarshan bhairav is also called Anga Vidya of Ma Baglamukhi.

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Baglamukhi Mantra Jaap Puja Vidhi in Hindi and English

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After receiving so many requests from the readers of this blog we are publishing all the mantras of ma baglamukhi including their viniyoga, Rishiyadi-Nyasa, Shadanga-Nyasa, Kara-Nyasa in Hindi and English. It will not only help english readers but also those readers who are not very good at sanskrit pronunciation. It took a lot of effort to publish such a document but it is my dedication to provide more and more information to the people who worship ma pitambara. I dedicate this work to ma pitambara’s lotus feet and my father and my guru shri yogeshwaranand ji who taught me everything. I will add more info in this document in near future. Please let me know if you find any mistake in english, hindi or sanskrit. Please visit this blog again and again for more and updated information.

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I am very pleased to say that we are taking a next step ahead in the field of spirituality by digitalizing all the available Sanskrit texts in the world related to secret mantras, tantras and yantras. In the first phase we will digitalize all the content provided by shri yogeshwaranand ji regarding das mahavidyas. We will not only make it available for Hindi and Sanskrit readers but also translate it into English so that whole world can get the benefits from our work. I can’t do it alone. To do the same I request all of you to help me achieve this goal.
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